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परम्परा, दिखावा, मज़बूरी या शोशेबाजी

Posted On: 30 Nov, 2012 Others में

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हमारे देश के दो मुख्य धर्म हैं- सनातन (जिसे ज्यादातर लोग हिन्दू धर्म के नाम से जानते हैं ) एवम मुस्लिम. दोनों में ही शादी, विवाह एवम अन्य नए संबंधो की शुरुवात चाँद की गड्नाओ के आधार पर ही प्रारम्भ होते हैं. मुस्लिमो में ईद एवम हिन्दुओ में देवोथान एकादशी के साथ ही शादी विवाह का शुभारम्भ हो जाता है. लेकिन विसंगति ये है की दोनों ही वर्गों में में प्रतिवर्ष प्रति शादी होने वाला खर्च बढ़ता ही जा रहा है. जिसके लिए वर एवम वधु पक्ष सामान रूप से जिम्मेदार हैं . इन सबमे दहेज़ का लेनदेन तो मुख्या कारण है ही उससे ज्यादा अहम् रोल है अधिक से अधिक लोगो को निमंत्रण करने का I आजकल परम्परा सी बन गयी है की ज्यादा से ज्यादा लोगो को बुलाया जाये I आजकल एक सामान्य परिवार की शादी में भी इक ही पक्ष की तरफ से १००० से ज्यादा लोगो को निमंत्रित किया जाता हैI सिर्फ ये दिखने के लिए की हमारे यहाँ अधिक लोग आये थे और हम समाज में अधिक मशहूर हैंI जबकि ऐसे कार्यक्रमों में मेजबान रश्में आदि निभाने में खुद इतने व्यस्त रहते हैं, की मेहमानों का ठीक से हाल चाल भी नहीं पूछ पाते I दूसरा ये है की अधिक लोगो के लिए प्रबंध करना पड़ता है I बहुत बार वह भी आर्थिक सामर्थ्य से अधिक हो जाता है I यही स्थति वर पक्ष से भी देखी जाती है, कोशिश करते हैं की अधिक से अधिक संख्या में लोग बारात में जाएँ I
जरा सोचिये क्या अधिक लोगो से वधु पक्ष पर खर्च का अधिक भार नहीं होगा ?…..यह संबंधो की शुरुवात है या दुश्मनी की ? …लड़की पक्ष के लिए क्या यह लड़की के पिता/ भाई होने का गर्व नही दंड ही लगता ही मुझे तो !!!

विचार कीजिये जिन संबंधो की सुरुआत ही आर्थिक सौदेबाजी , मानव खरीददारी (दहेज़ क्योंकि आजकल दूल्हो की भी कीमत लगायी जाती है ) , दिखावा , शोशेबाजी से रखी जाती है वह प्यार, आत्मीयता , स्नेह, अपनापन, एवम स्थायित्व कहाँ से आयेगा ? क्या लड़की के भाई पिता को कर्ज का राक्षस चैन से रहने देगा ??
वही हम देखें तो गत वर्ष ब्रिटेन की शाही खानदान ( जो की आर्थिक रूप से लाखो लोगो के लिए सक्षम है) की शाही शादी में कुल १९०० लोग पूरी दुनिया से आमंत्रित किये गए थे. जिसमे बड़ी संख्या राजनैतिक डिप्लोमेट , राजदूत, राजनेताओ की थी, जबकि हमारे यहाँ एक ही पक्ष इससे ज्यादा मेहमानों को आमंत्रित कर देता है. जब वो लोग कम मेहमानों से काम चला सकते हैं तो हम क्यों नहीं ? जबकि उनपर तो सारी दुनिया की निगाहें भी टिकी हुई थी I हमें चाहिए की केवल अत्यधिक नजदीकी मित्रो अवं सम्बन्धियों को ही आमंत्रित किया जाये I जिससे अव्यवस्था भी नहीं होगी I देखने में ये आता है की अगर किसी पार्टी में १००० लोग आये हुए हैं तो वे एक साथ ही भोजन पंडाल में आ जाते हैं I जिससे वहां अव्यवस्था हो जाती है और बच्चो, वृद्दो एवम महिलाओ के लिए अति कष्टकारक स्थति बन जाती है I
कुछ लोगो को लग रहा होगा की लोगो को आमंत्रित नहीं किया जायेगा तो वे नाराज हो जायेंगे I ऐसा नहीं है क्योंकि शुभ मुहूर्त के चक्कर में अधिकतर शादियाँ एक ही दिन होती हैं जिससे एक ही व्यक्ति को कई कई जगह पर जाना होता है I तब ऐसी स्थति में समय प्रबंधन काफी कठिन हो जाता है एवम मेहमान उपस्थति ही दर्ज करने आते हैं I इसमें भी उन्हें दूसरी शादी में जाने की जल्दी लगी रहती है जिससे रफ ड्राइविंग एवम ओवर स्पीडिंग को बढ़ावा मिलता है जिसका परिणाम दुर्घटनाओ के रूप में सामने आता है I दूसरा जो वास्तविक मित्र एवम सम्बन्धी हैं वो कभी भी अच्छी बात का बुरा नहीं मानेगा I सच्चा मित्र व सम्बन्धी कभी नहीं चाहेगा की आपके समारोह में अव्यवस्था हो I वैसे भी सारी जमा – पूंजी एक ही दिन में सिर्फ दिखावे के लिए लुटा देना भी तो कही कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है I इतिहास की तारीख गवाह है की जितनी भी सल्तनत गयी हैं तो उसमे दिखावा ओर शोशेबाजी ही महत्त्वपूर्ण कारण थी I हम उन गलतियों से सबक क्यों नहीं लेते I सही ही कहा है..
“अगर रोकनी है बर्बादी, बंद करो खर्चीली शादी….”
एक और बात जो आजकल चल रही है दोनों ही सम्प्रदायों में दहेज़ एवम मेहर की रकम I मुस्लिमो में मेहर की रकम बढती ही जा रही है वही दहेज़ की भी बोलिया लगती हैं I इन सबमे भी मुद्रा का अवैधानिक हस्तांतरण ही होता है I मेहर की बढती रकम के बारे में तो हाल ही में अफगानिस्तान के राष्ट्र – पति श्री हामिद करजई ने भी चिंता व्यक्त की थी I इससे महंगाई के इस युग में आर्थिक परेशानियों के साथ ही मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ती है और कभी कभी तो लड़की का पिता या भाई होना भी एक अपराध सा नजर आता है I

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mayankkumar के द्वारा
December 4, 2012

आपका लेख वाकई नज़रों को आपकी कलम की ओर खींचता प्रतीत होता है …… सधन्यवाद … !!


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